कसरावद (खरगोन)। अनीस खान
शासकीय महाविद्यालय कसरावद में लोकमाता देवी अहिल्याबाई होलकर की 300वीं जयंती के अवसर पर, “धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहर की रक्षक लोकमाता देवी अहिल्याबाई” विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय वेबिनार का सफल आयोजन किया गया। इस आयोजन में प्रदेश एवं अन्य राज्यों से करीब 350 शिक्षाविद, प्राध्यापकगण और शोधार्थी शामिल हुए।
💡 कार्यक्रम का शुभारंभ और विचार:
- शुभारंभ: कार्यक्रम का शुभारंभ प्राचार्य डॉ. राकेश ठाकुर एवं संयोजक डॉ. विजय सिंह मंडलोई तथा प्राध्यापकों द्वारा माँ सरस्वती पर पुष्प अर्पित कर किया गया।
- प्राचार्य का विचार: प्राचार्य डॉ. राकेश ठाकुर ने देवी अहिल्याबाई के जीवन दर्शन पर अपने विचार व्यक्त किए।
- संयोजक: संयोजक डॉ. विजय सिंह मंडलोई ने माता अहिल्या के जीवन दर्शन और उनकी धार्मिक निष्ठा पर प्रकाश डाला।
🗣️वक्ताओं के प्रमुख उद्बोधन:
वेबिनार में देश के विभिन्न हिस्सों से आए विद्वानों ने लोकमाता के महान कार्यों पर प्रकाश डाला:
- संरक्षक डॉ. आर. सी. दीक्षित (अतिरिक्त संचालक, उच्च शिक्षा): उन्होंने कहा कि देवी अहिल्याबाई होलकर भारतीय इतिहास की उन दुर्लभ महिलाओं में से हैं, जिन्होंने अपने आध्यात्मिक सनातन धर्म और जन सेवा के माध्यम से समाज को नई दिशा दी। वे सिर्फ मालवा की महारानी नहीं, बल्कि लोकमाता, धर्म नायिका और आदर्श शासिका थीं।
- डॉ. जी. एस. चौहान (प्राचार्य, अग्रणी महाविद्यालय): उन्होंने बताया कि देवी अहिल्या ने धार्मिक सहिष्णुता को शासन की नींव बनाया और मालवा को आर्थिक रूप से सशक्त किया। उन्होंने स्त्री-पुरुष समानता की नींव रखी और साबित किया कि नेतृत्व केवल पुरुष का अधिकार नहीं है।
- डॉ. आर. एन. पाठक (प्राध्यापक, बीएचयू, वाराणसी): उन्होंने देवी अहिल्या के लिए उपयोग होने वाले पर्यायवाची शब्द ‘पुण्य श्लोका’ का संदर्भ दिया, जो सतयुग के राजाओं के लिए लगता था। उन्होंने कहा कि 300 वर्ष बाद भी देश उन्हें कर्म परायण, दूरदर्शी और लोक कल्याणकारी के रूप में याद करता है।
- डॉ. संतोष कुमार चरण (प्राध्यापक, राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर): उन्होंने कहा कि देवी अहिल्या ने विभव का त्याग किया और अपनी संपत्ति जनता के कल्याण में लगाई। उन्होंने महेश्वर को राजधानी बनाया, और काशी विश्वनाथ, सोमनाथ, केदारनाथ, बद्रीनाथ, द्वारका सहित संपूर्ण भारत के धार्मिक स्थलों का पुनर्निर्माण कराया।
निष्कर्ष:
वक्ताओं ने सर्वसम्मति से कहा कि देवी अहिल्याबाई ने अपने जीवन, प्रशासनिक नीतियों, धार्मिक दृष्टिकोण और सेवा भावना से शासन तंत्र का ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया है, जो आज भी प्रासंगिक है।
कार्यक्रम का संचालन डॉ. दयाराम राजपूत ने किया और आभार प्रदर्शन संयोजक डॉ. विजय सिंह मंडलोई ने किया। इस दौरान महाविद्यालय के प्राध्यापकगण, डॉ. शोभाराम सोलंकी, डॉ. रश्मि चौहान, प्रो. मंगल भाटिया सहित अन्य स्टाफ और विद्यार्थी उपस्थित थे।


